Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 186, Verses 19–21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 186, verses 19–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 186 · श्लोक 19-21
संस्कृत श्लोक
यथा पुंसो नखाः पादावेकमेव शरीरकम् ।
तथैकमेवाप्रतिघं चितः स्थावरजङ्गमम् ॥ १९ ॥
आदिसर्गे स्वप्न इव यत्प्रथामागतं स्थितम् ।
चितो रूपं जगदिति तत्तथैवान्त उच्यते ॥ २० ॥
तच्चैवाप्रतिघं शान्तं यथास्थितमवस्थितम् ।
न प्रथामागतं किंचिन्नासीदप्रथितं हितम् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी के इतना कहने पर वक्ताओं में
श्रेष्ठ मुनिप्रवर वसिष्ठजी कुन्ददन्त की ओर देखकर बोले : हे अनघ, हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, कुन्ददन्त, कहो
मेरे कहे हुए मोक्ष देनेवाले इस शास्त्र को सुनकर तुमने किस ज्ञातव्य को जाना ? कुन्ददन्त ने कहा :
भगवन्, सम्पूर्ण संशयों का विनाशक मेरा चित्त ही मेरी विजय के लिए है । मेरे सभी सन्देहो की निवृत्ति
हो गई है, क्योकि अवश्यज्ञेय अखंडित ब्रह्मतत्त्व मेँ जान चुका हू