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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 186, Verses 12–15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 186, verses 12–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 186 · श्लोक 12-15

संस्कृत श्लोक

दृश्यमेव परं ब्रह्म परं ब्रह्मैव दृश्यता । एतन्न शान्तं नाऽशान्तं नानाकारं न चाकृतिः ॥ १२ ॥ यादृग्प्रबोधे स्वप्नादिस्तादृग्देहो निराकृतिः । संविन्मात्रात्मा प्रतिघः स्वानुभूतोऽप्यसन्मयः ॥ १३ ॥ संविन्मयो यथा जन्तुर्निद्रात्मास्ते जडोभवत् । जडीभूता तथैषास्ते संवित्स्थावरनामिका ॥ १४ ॥ स्थावरत्वाज्जडाच्चित्त्वं जङ्गमात्म प्रयाति चित् । जीवः सुषुप्तात्मा स्वप्नं जाग्रच्चैव जगच्छतैः ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

वहाँ तुम उनके पास जाओ, क्योंकि उनके कुलगुरु वसिष्ठनामक मुनिश्रेष्ठ उन श्रीरामचन्द्र के लिए सभा में मोक्षउपाय की दिव्य कथा कहेगे । हे द्विज, चिरकालतक उसे सुनकर तुम उस पावन परम पद में मेरी ही तरह विश्रान्ति को प्राप्त हो जाओगो। इतना कहकर वह मुनि समाधानरूप ओषधि के समुद्र अर्थात्‌ समाधि में प्रविष्ट हुआ और मैं यहाँ आपके पास प्राप्त हुआ हूँ। यही मैं हूँ और यह मेरा वृत्तान्त जैसा हुआ, जैसे देखा और जैसे सुना वह सम्पूर्ण मैंने कह दिया