Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 186, Verses 23–26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 186, verses 23–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 186 · श्लोक 23-26
संस्कृत श्लोक
स्थित एको ह्यनाद्यन्तः परमार्थघनो यतः ।
प्रलयस्थितिसर्गाणां न नामाप्यस्ति मां प्रति ॥ २३ ॥
प्रलयस्थितिसर्गादि दृश्यमानं न विद्यते ।
एतन्न चात्मनश्चान्यच्चित्रे चित्रवधूर्यथा ॥ २४ ॥
कर्तव्यचित्रसेनास्माद्यथा चित्रान्न भिद्यते ।
नानाऽनानैव प्रतिघा चित्तत्त्वे सर्गता तथा ॥ २५ ॥
विभागहीनयाप्येष भागश्चिद्धननिद्रया ।
सुषुप्तान्मुष्यते मोक्ष इति स्वप्नस्तु चित्तकम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
यह आत्मचिति आपसे मैने जान ली हे ।
यह सब अखण्ड परमार्थघन आकाश में आत्मा से अनन्य जगत्रूप से स्फुरित है । सर्वात्मक होने से
सर्वरूपी सर्वव्यापी आत्मा का सभी कुछ सब प्रकार से सर्वत्र सर्वदा पूर्णरूप से संभव होता है। सरसों के
कण के अन्दर भी सर्वकल्पनाशक्तियुक्त अधिष्ठानभूत चित् का अस्तित्व होने से उसके अन्दर भी
मायादुष्टि से अनन्त जगतो का संभव है, किन्तु इस चित् का पूर्णरुप से ज्ञान होने पर तो वास्तविक
दृष्टि से कहीं पर भी जगतां का संभव नहीं हे । गृह के अन्दर ही सप्तद्वीपा पृथ्वी उत्पन्न होती है और गृह
शून्य ही हे । यह निःसंन्देह सत्य हे