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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 183

एक सौ इक्यासीवाँ सर्ग समाप्त एक सौ बयासीवाँ सर्ग कदम्ब वृक्ष के नीचे स्थित तपस्वी द्वारा घर में उसके भाईयों का समागम और वर तथा शापों की हेतुसिद्धि का वर्णन |

28 verse-groups

  1. Verse 1वृद्ध तपस्वी ने कहा : हे सज्जनो, भगवती गौरी उसी इस कदम्ब में अपनी इच्छा से दस वर्ष बैठकर…
  2. Verses 2–13उनके स्पर्शरूपी अमृत से सीचा गया यह कदम्बवृक्षरूपी देवीपुत्र गोद में बैठा हुआ-सा हो, कभी…
  3. Verse 14हे देवि, हमारी सप्तद्रीपेश्वरता की स्थिति के समय प्रजाभूत सब लोग झूठे व्यवहार का परित्याग…
  4. Verse 15वह भगवती इष्टदेवी उनके इच्छित अर्थ को, आदरपूर्वक स्वीकार कर तथा उनसे "एवमस्तु" कहकर अन्तध…
  5. Verses 16–17बैठा रहता हूँ
  6. Verse 18इसके बाद इस ऋतु,संवत्सर आदिरूप समय के बीतने पर आसपास में रहनेवाले लोगों ने सम्पूर्ण वन छि…
  7. Verse 19कभी न मुरञ्चानेवाले इस कदम्ब वृक्ष को, इसे वागीश्वरी का मन्दिर समझकर, लोग खूब पूजते हैं ।…
  8. Verse 20इसके पश्चात्‌ तो आप दोनों महातपस्वी इस प्रदेश में आये यह सब ध्यान से देखा गया सम्पूर्ण वृ…
  9. Verses 21–22इसलिए हे साधुपुरुषों, यहाँ आये हुए आप लोग उठकर घर जायें । वहाँ आपके सब भाइयों का स्त्री-ब…
  10. Verses 23–24हे आर्य सभासदो, उसके यह कहने पर मैंने सन्देह से उस महातपस्वी से यह आश्चर्य वृत्तान्त पूछा…
  11. Verse 25कदम्बतपस्वी ने कहा : हे सज्जनो, इन लोगों के सम्बन्ध में यही केवल असंबद्ध वृत्तान्त है यह…
  12. Verse 26ये आठ तपस्वी भाई देह-नाश होने पर वहाँ घर के अन्दर ही सब सप्तद्वीप के अधिपति होगे
  13. Verse 27ये आठ भाई इन्हीं घरों में इन्हीं महासिंहासनों पर सप्तद्रीपाधिपति राजा होंगे यह मुझसे सुनि…
  14. Verse 28इन आठ भाईयों की पूर्व आदि दिशाओं की नियत आठ ताराओं की तरह आठ श्लाघनीय भायर्णि है
  15. Verse 29वे आटो पलिनर्यो इनके तपस्या के लिए चले जाने पर चिरकालतक अति दुःखी रहीं, क्योकि स्त्रियों…
  16. Verses 30–31पतियों का बार बार स्मरण होने पर दुःखी होकर उन्होने शतचान्द्रायण रूप घोर तप किया | उससे भग…
  17. Verses 32–34देवीजी ने कहा : हे पुत्रि, जैसे गर्मी से मंजरी (बोर) चिरकालतक क्लेश पाती हे वैसे ही दीर्घ…
  18. Verses 35–36सुवासिनी ने (सौभाग्यवती ने) कहा : हे देवि, देवदेव भगवान्‌ श्री शिवजी के साथ जैसा आपका प्र…
  19. Verses 37–38सुवासिनी ने कहा : हे देवि, मेरे लिए यह वर अलभ्य है तो जब अपने घर में मेरे पति का देहपात ह…
  20. Verse 39देवीजी ने कहा : हे पत्रि, एेसा ही हो, (उस मूर्खा को उत्तम वर याचना में अकुशल देखकर देवी स…
  21. Verses 40–42जैसे लोक-कल्याण के लिए निर्दोषरूप से उद्यत हुई मेचमाला की ध्वनि बन्द होती है वैसे ही उत्त…
  22. Verse 43हे साधो, सत्कर्मो के फलों में बाधा डालनेवाली इनकी यह दूसरी असमंजसपूर्ण आश्चर्यकारी दुर्घट…
  23. Verse 44इन आठों भाइयों के तप करते समय इनके दुःखी माता-पिता इनकी बहूओं के साथ तीर्थ ओर मुनियों के…
  24. Verse 45वे शरीर सुख की कोई परवाह न कर अपने पुत्र की कल्याणकामना से प्रसिद्ध कलापग्राम नामक तीर्थ…
  25. Verses 46–48जब वे अपने घर से रवाना हुए तो मुनियों के आश्रमो के मार्ग में एक सफेद (वृद्ध) पुरुष उन्हें…
  26. Verse 49इस प्रकार जा रहे तुम्हारे बहूओं ओर पुत्रों की तपस्या से उपार्जित प्राप्त हुए महावर विपरीत…
  27. Verses 50–52इसके वाद दुर्वासा मुनि के यह कहने के अनन्तर स्त्री ओर बहूओं के साथ वह मुनि का प्रणाम आदि…
  28. Verses 53–70इस प्रकार अन्यत्र भी (इस मायामय जगत्‌ में भी) लाखों असमंजसों का संभव है, ऐसा कहते हैं। जै…