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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 183, Verses 50–52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 183, verses 50–52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 183 · श्लोक 50-52

संस्कृत श्लोक

ब्रह्मोवाच । युक्तं युष्माभिरस्माभिः सर्वं व्योमात्मकं जगत् । स्थितं चित्परमाण्वन्तरन्तःस्वप्नोऽनुभूयते ॥ ५० ॥ भाति यत्परमस्याणोरन्तस्थस्वगृहोदरे । स्फुरितं तत्किमाश्चर्य कः स्मयः प्रकृतेः क्रमे ॥ ५१ ॥ मृतेरनन्तरं भाति यथास्थितमिदं जगत् । शून्यास्मैव घनाकारं तस्मिन्नेव क्षणे चितः ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

इसके वाद दुर्वासा मुनि के यह कहने के अनन्तर स्त्री ओर बहूओं के साथ वह मुनि का प्रणाम आदि द्वारा आदर करने के लिए ज्यों प्रवृत्त हुआ त्यों ही मुनि अन्तर्हित हो गये । फिर उनके माता-पिता उनकी बहूओं के साथ अति दुःखी हुए । दुःख के मारे उनका शरीर सूखकर कृश हो गया ओर मुंह फीका पड़ गया, वे पुत्रं के कल्याण की आशा छोडकर घर लोट आये । इसलिए मैं कहता हूँ कि उनका एक ही वृत्तान्त असमंजस (दुविधा) नहीं है, अपितु जैसे गले में हुए घेघे (गला सूखने का एक रोग) पर अनेक फोड़ हों और वे फूट जाय वैसे ही उनके लाखों असमंजस हैं