Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 183, Verses 30–31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 183, verses 30–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 183 · श्लोक 30,31
संस्कृत श्लोक
वरदस्य हि या संविद्वरो दत्त इति स्थिता ।
सैवार्थिनि मया लब्धो वरोऽयमिति तिष्ठति ॥ ३० ॥
विज्ञप्तिमात्रकचनं देहं सैव फलं ततः ।
पश्यत्यनुभवत्यत्ति देशकालशतभ्रमैः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
पतियों का बार बार स्मरण होने पर दुःखी होकर उन्होने शतचान्द्रायण रूप घोर तप
किया | उससे भगवती पार्वती उनके ऊपर प्रसन्न हुई । अन्तःपुरगृह में पूजा के समय अदृश्य होकर
भगवती पार्वतीजी उनसे अलग अलग बोलीं