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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 183, Verses 46–48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 183, verses 46–48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 183 · श्लोक 46-48

संस्कृत श्लोक

व्रजतैतदपेक्षत्वं यावन्नेष्टावपि क्षणात् । चिरं चिराय सदने सप्तद्वीपेश्वराः स्थिताः ॥ ४६ ॥ समनन्तरमेवैते देहपातात्स्वसद्मसु । सप्तद्वीपेश्वराः सर्वे संपन्नाः परमं वराः ॥ ४७ ॥ सर्वे वरा वदिष्यन्ति । कुतो भूमण्डलान्यष्टौ सप्तद्वीपानि भूतयः । एकमेवेह भूपीठं श्रुतं दृष्टं च नेतरत् ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

जब वे अपने घर से रवाना हुए तो मुनियों के आश्रमो के मार्ग में एक सफेद (वृद्ध) पुरुष उन्हें दीख पड़ा । उसका रंग कपिल (कोहड के समान लाली लिये पीला) था, कद नाटा था, शरीर पर भस्म रमी थी ओर सिर के बाल खड़े थे । वे आठों भाइयों के माता-पिता यह कोई बूढा पथिक होगा, इस आशंका से उस मुनि का अपमान कर (नमस्कार, पूजा, स्तुति आदि आदर न कर) प्रत्युत गमनत्वरा से उसके ऊपर धूलिकणों का प्रक्षेप करते हुए जब आगे बढ़े तब उक्त अपराध से क्रुद्ध हुए उस मुनि ने कहा : हे बहूसहित महामूर्ख, स्त्री के साथ तीर्थाभिलाषी होकर मुझ दुर्वासा ऋषि का अपमान कर मुझे नमस्कार आदि किये बिना जाता है ?