Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 183, Verses 37–38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 183, verses 37–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 183 · श्लोक 37,38
संस्कृत श्लोक
समेनोभयकोटिस्थं मिश्रं वस्तु भवेत्समम् ।
वरशापविलासेन क्षीरमिश्रं यथा पयः ॥ ३७ ॥
समाभ्यां वरशापाभ्यामथवा चिद्द्विरूपताम् ।
स्वयमेवानुभवति स्वप्नेष्विव पुरात्मिका ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
सुवासिनी ने कहा : हे देवि, मेरे लिए यह वर अलभ्य है तो जब अपने
घर में मेरे पति का देहपात हो तो मेरे मृत पति का जीव घर के अन्दर से एक क्षण के लिए भी बाहर
न जाय । हे अम्बिके, "यह हो" ऐसा वर मुझे दीजिये