Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 183, Verses 2–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 183, verses 2–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 183 · श्लोक 2-13
संस्कृत श्लोक
एकैव सप्तद्वीपास्ति वसुधा यत्र तत्र ते ।
सप्तद्वीपेश्वरा अष्टौ भवन्ति कथमुत्तमाः ॥ २ ॥
यस्य जीवस्य सदनान्नास्ति निर्गमनं बहिः ।
स करोति कथं सप्तद्वीपेशत्वेन दिग्जयम् ॥ ३ ॥
शापस्थानका वदिष्यन्ति ।
सप्तद्वीपेशजीवानां निर्याणं शवसद्मनः ।
देवेश विद्मो न वयमन्धकूपादिवाम्भसाम् ॥ ४ ॥
मिथोऽशक्यां कथं धर्मौ स्थितिमेकत्र गच्छतः ।
आधार एवाधेयत्वं करोति कथमात्मनि ॥ ५ ॥
गौर्याश्रमतापस उवाच ।
संपश्यसि किमेतेषां भो साधो शृण्वनन्तरम् ।
अष्टमेऽस्मिन्सुसंप्राप्ते तं प्रदेशं सबान्धवम् ॥ ६ ॥
इतो भवन्तौ तं देशमासाद्य सुखसंस्थितौ ।
स्वबन्धुसुखसंस्थानौ कंचित्कालं भविष्यतः ॥ ७ ॥
ततस्तेऽष्टौ मरिष्यन्ति भ्रातरः क्रमशो गृहे ।
बन्धवोऽथ करिष्यन्ति तेषां देहांस्तदग्निसात् ॥ ८ ॥
तेषां ते संविदाकाशाः पृथक्पृथगवस्थिताः ।
मुहूर्तमात्रं स्थास्यन्ति सुषुप्तस्था जडा इव ॥ ९ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तेषां तानि कर्माणि धर्मतः ।
एकत्र संघटिष्यन्ति वरशापात्मकानि खे ॥ १० ॥
कर्माणि तान्यधिष्ठातृदेवरूपाणि पेटकम् ।
वरशापशरीराणि करिष्यन्ति पृथक् पृथक् ॥ ११ ॥
वरास्तेऽत्र गमिष्यन्ति सुभगाः पद्मपाणयः ।
ब्रह्मदण्डायुधाश्चन्द्रधवलाङ्गाश्चतुर्भुजाः ॥ १२ ॥
शापास्तत्र भविष्यन्ति त्रिनेत्राः शूलपाणयः ।
भीषणाः कृष्णमेघाभा द्विभुजा भ्रुकुटीमुखाः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
उनके स्पर्शरूपी अमृत से सीचा गया यह
कदम्बवृक्षरूपी देवीपुत्र गोद में बैठा हुआ-सा हो, कभी पुराना नहीं होता उसके अनन्तर भगवती
श्रीगोरी के चले जाने के बाद उस प्रकार की विभूतिवाला वह महावन साधारण वनों की तरह
जनसाधारण का घास, लकड़ी, फल-फूल आदि आहरण से जीविका का साधन बन गया | मालव
नाम का प्रसिद्ध देश हे । उसमें मैं राजा था । किसी समय राज्य का परित्याग कर मुनियों के आश्रमां
मे घूमता घूमता मैं इस प्रदेश मे आ पहुँचा | यहाँ पर आश्रमवासियों का आदर सत्कार पाकर इस
कदम्ब के पेड के नीचे समाधि लगा कर बैठ गया । इसके पश्चात कुछ समय बीतने पर आप अपने
सात भाईयों के साथ तपस्या करने के लिए पहले इस आश्रम में आये | वे आठ तपस्वी उस समय
उस प्रकार के तपस्वी बनकर यहाँ रहे जिस प्रकार अन्य जो तपस्वी उस समय थे उनके भी संमान्य
(पूज्य) वे हो गये । तदुपरान्त कुछ काल के अनन्तर उनमें से यह आप तपस्या के लिए श्रीपर्वत को
चले गये, दूसरा भाई स्वामी कातिकिय के समीप क्रौचपर्वत को गया, तीसरा भाई काशी को गया ओर
चौथा हिमालय को गया । अवशिष्ट चार धृतिमान् भाइयों ने यहीं पर परम तपस्या की । उनमें से
सबकी एकमात्र यही अभिलाषा थी कि मैं समस्त द्रीपवाली इस पृथिवी का अधिपति होऊँ । इसके
पश्चात् तपस्या से सन्तुष्ट हुए इष्ट देवताओं ने श्रेष्ठतम वरों से उन सभी की वह अभिलाषा पूर्ण
की । तदनन्तर आपको तपस्या करते छोडकर शेष सब भाई जैसे धर्मप्रधान कृतयुग का भूमि में
उपभोग कर उसके अन्त में ब्रह्मा ब्रह्मलोक को जाते हैँ वैसे ही अपने घर चले गये । उत्तम वरदान
के समय आपके उन भाइयों ने वर देने के लिए तैयार अपनी इष्टदेवियों की प्रयत्नतः यह प्रार्थना
की