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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 177

एक सौ पचहत्तरवाँ सर्ग समाप्त एक सो छिहत्तरवाँ सर्ग॑ सृष्टि के आरम्भ में चिदणु में स्वप्न की तरह ब्रह्माण्डों का भान होता है इस विषय में ब्रह्माजी द्वारा उक्त ब्रह्माण्डाख्यान का वर्णन |

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  1. Verse 1यदि दृश्य असत्‌ है" यों दृश्य के वाध द्वारा चिन्मात्र का परिशेष ही पुरुषार्थ है तो अज्ञान…
  2. Verse 2केवल वर्तमान दृश्य का ही शास्त्र में उपन्यास करना चाहिये अतीत अनागत अन्य किसी जगत्‌ के उप…
  3. Verse 3जो कथा सुनिश्चित वाक्यवाचकभाववाले शब्द-अर्थीं द्वारा कही जाती है वही हृदयंगम होती है, वही…
  4. Verse 4यदि तत्त्वज्ञानियों में प्रसिद्ध त्रिकाल में निर्मल दर्शनवाले तत्त्व का पर्यालोचन करोगे त…
  5. Verse 5ही अतीत, अनागत आदि सकल सृष्टियों के आदि में चिन्मात्र का ही जगद्रूप से भान होता है, केवल…
  6. Verse 6उनकी अनन्त विचित्रता क्यों प्रकृतोपयोगी नहीं है ऐसा यदि प्रश्न हो तो असंख्य होने के कारण…
  7. Verses 7–8“अणु अणु में असंख्य जगत्‌ है" इस विषय में कमल के पराग से व्याप्त शरीरवाले मेरे पिता श्रीब…
  8. Verses 9–10इस पर श्रीब्रह्माजी ने कहा : हे मुने, ब्रह्म ही सम्पूर्ण जगत्रूप से भासता है ज्ञानियों की…
  9. Verses 11–12आकाश में शून्यत्व के समान ओर वायु के शुद्ध स्पन्दन के तुल्य आकाश से अभिन्नस्वरूप चिदाकाश…
  10. Verses 13–14तदुपरान्त अपनी अविकारिता, असंगता, पूर्णता ओर सूक्ष्मता का त्याग न कर रहे उस जीव ने आकाशरू…
  11. Verse 15विकल्पाभासों के आरोपण द्वारा अविकल्प आत्मा को स्वयं निम्न स्तर पर पहुँचा रही बुद्धि ने स्…
  12. Verses 16–18तदनन्तर उक्त निराकार मन ने स्वप्न में देहवर्ती पाँच ज्ञानेन्द्रियों को वैसे ही देखा जैसे…
  13. Verses 19–44इस स्वप्न में प्रत्येक व्यष्टि जीव दर्पण में प्रतिबिम्बित एेसे, द्रष्टा, दृश्य, दर्शन, भो…