Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 177, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 177, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 177 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
अकारणकमेवेदं जगद्ब्रह्म परात्पदात् ।
यदि प्रवर्तते नाम स्वप्नसंकल्पनादिवत् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि दृश्य असत् है" यों दृश्य के वाध द्वारा चिन्मात्र का परिशेष ही पुरुषार्थ है तो अज्ञान सहित
वर्तमान ही दृश्य जगत् के बन्धनरूप होने से उसी की निवृत्ति करना उचित है । अतीत तथा अनागत
(भविष्यत्), प्रतीत न हो रहे तथा अवर्तमान जगर्तो का परिमार्जन तो प्रकृतोपयोगी नहीं है । क्योकि
वे तो अप्रतीतिवश ही बन्धनभूत नहीं हो सकते हैं, इसलिए शास्त्र में उनके जिक्र का कोई मतलब
नहीं है, ऐसी श्रीरामचन्द्रजी शंका करते हैं ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्, अतीत (भूत) ओर भविष्यत् असंख्य जगत् हैं उनके वृत्तान्तों से
आप मुञ्चे क्यों प्रबुद्ध करा रहे हैं यानी मुझे बोध कराने के लिए उनका उल्लेख उपयोगी नहीं है
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ पचहत्तरवाँ सर्ग समाप्त एक सो छिहत्तरवाँ सर्ग॑ सृष्टि के आरम्भ में चिदणु में स्वप्न की तरह ब्रह्माण्डों का भान होता है इस विषय में ब्रह्माजी द्वारा उक्त ब्रह्माण्डाख्यान का वर्णन |