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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 177, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 177, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 177 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

यथेदं कल्पितं दृश्यं मनसा येन तत्तथा । वेत्त्यसौ यादृगन्येन कल्पितं वेत्त्यसौ तथा ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि तत्त्वज्ञानियों में प्रसिद्ध त्रिकाल में निर्मल दर्शनवाले तत्त्व का पर्यालोचन करोगे तो सर्वज्ञ अपने ही दृष्टा होने के कारण अतीत, भविष्यत्‌, व्यवहित (व्यवधान में स्थित), अतिदूरवर्ती अनन्त ब्रह्माण्डों की वर्तमान इस ब्रह्माण्ड से रंचमात्र भी विशेषता न होने के कारण आपका यह आक्षेप उठ ही नहीं सकेगा, इस आशय से कहते हैं। जब आप ज्ञात-ज्ञेय होकर भूत, भविष्यत्‌ और वर्तमान तीनों कालों मे निर्मल दृष्टिवाले होगे तब उन सबको (अतीत, अनागत, व्यवहित, अतिदूर के ब्रह्माण्डों को) प्रत्यक्ष ही जानेंगे