Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 177, Verses 7–8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 177, verses 7–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 177 · श्लोक 7,8
संस्कृत श्लोक
यतः स्याद्ब्रह्मणस्त्वन्यत्क्वचित्किंचित्कदाचन ।
तत्कारणविकल्पेन संयोगस्तस्य युज्यते ॥ ७ ॥
यत्र सर्वमनाद्यन्तं नानानानात्म भासते ।
ब्रह्मैव शान्तमेकात्म तत्र किं कस्य कारणम् ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
“अणु अणु में असंख्य जगत् है" इस विषय में कमल के पराग
से व्याप्त शरीरवाले मेरे पिता श्रीब्रह्माजी ने जो आख्यान पहले कभी मुझसे कहा था उसे मैं आपसे
कहता हूँ, सुनिये । पहले किसी समय मैं श्री ब्रह्माजी से पूछ बैठा कि “भगवन्, यह जगज्जाल कितना
विशाल है ओर कहाँ पर इसका भान है यह मुझसे कहने की कृपा कीजिये ।“