Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 177, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 177, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 177 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
यद्यथा कल्पितं येन स संपश्यति तत्तथा ।
कल्पनैवान्यथा न स्यात्तादृक्कारणविच्युतेः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
जो कथा सुनिश्चित वाक्यवाचकभाववाले शब्द-अर्थीं
द्वारा कही जाती है वही हृदयंगम होती है, वही यहाँ व्यवहार में उपयोगी होती है अन्य नहीं, ज्यों केवल
लौकिक बुद्धि के अनुसार आलोचन करने पर आपने बहुत ठीक आक्षेप किया, यह अर्थ हे