Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 177, Verses 9–10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 177, verses 9–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 177 · श्लोक 9,10
संस्कृत श्लोक
नेह प्रवर्तते किंचिन्न च नाम निवर्तते ।
स्थितमेकमनाद्यन्तं ब्रह्मेव ब्रह्म खात्मकम् ॥ ९ ॥
किं कस्य कारणं केन किमर्थं भवतु क्व वा ।
किं कस्य कारणं केन किमर्थं मास्तु वा क्वचित् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
इस पर श्रीब्रह्माजी
ने कहा : हे मुने, ब्रह्म ही सम्पूर्ण जगत्रूप से भासता है ज्ञानियों की दृष्टि में ब्रह्मसत्ता से यह अनन्त
है ओर अज्ञानियों की दृष्टि में भी जगद्रूप से अनन्त है। कानों के लिए आभूषण स्वरूप मेरे इस सुन्दर
आख्यान को, जो ब्रह्माण्ड पिण्ड और ब्रह्माण्डाख्यान इन यथार्थ नामों से प्रसिद्ध है, सुनो