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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 177, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 177, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 177 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

तदकारणतः सिद्धेः संभवेऽन्यदकारणम् । कथं न जायते वस्तु क्वचित्किंचित्कदाचन ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

केवल वर्तमान दृश्य का ही शास्त्र में उपन्यास करना चाहिये अतीत अनागत अन्य किसी जगत्‌ के उपन्यास की आवश्यकता नहीं है, यह आपके आक्षेप का निचोड़ निकलता है। वह ठीक नहीं है। पद ओर पदार्थ का सम्बन्ध, व्याप्ति ग्रह तथा दृष्टान्तसिद्धि आदि अतीत व्यवहार के अधीन हैं, अतीत जगत्‌ के उपन्यास के बिना विचारात्मक शास्त्र में प्रवृत्ति ही नहीं हो सकती है । इसलिए अतीत, आगे होनेवाले ब्रह्माण्डों का तथा वर्तमान अन्य ब्रह्माण्डों का, शब्द-अर्थ के सम्बन्ध ग्रह आदि में उपयोग न होने के कारण, उपन्यास नहीं करना चाहिये इतना ही आक्षेप करना उचित हो तो कीजिये यों अनादर से उसका स्वीकार कर रहे से भगवान्‌ श्री वसिष्ठ जी उत्तर देते हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इस शास्त्र में जगत्रूप स्वप्नं मे शब्द ओर अर्थ का वाच्यवाचकभावसम्बन्ध क्या आपको ज्ञात नहीं हुआ ? इसलिए इस शास्त्र को सुनाने के लिए नियुक्त पुरुष ने उनका कथन व्यर्थ नहीं किया