Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 172
एक सौ सत्तरवाँ सर्ग समाप्त एक सौ इकहत्तरवाँ सर्ग जीवन्मुक्ति की सिद्धि तथा सकल संशयो की निवृत्ति के लिए फिर तत्त्वोपदेश द्वारा दृश्य का परिमार्जन करना |
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- Verses 1–3श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, यह चिदाकाश का स्फुरण ही जगत् के रूप से प्रती…
- Verses 4–5“सदेव सोम्येदमग्र आसीत्', यदा तमस्तन्न दिवा न रात्रिर्न सन्न चासन् शिव एव केवलः, इत्याद…
- Verse 6इससे यह सिद्ध हुआ कि यह मूर्तं जगत् वन्ध्यापुत्र की नाई उत्पन्न ही नहीं हुआ, अतः दृश्यबु…
- Verse 7तब प्रत्यक्षतः द्ष्टिगोचर हो रहे जगत् की क्या गति होगी ? इस प्रश्न पर कहते हैं। जो यह चा…
- Verses 8–15जैसे स्वच्छ (निर्मल) चिन्मात्र निर्विकार अपने स्वरूप का त्याग न करता हुआ आत्मा ही सुषुप्त…
- Verses 16–17सब भूर्तो का निर्विषय चिन्मात्र ही निज स्वभाव है, ऐसा कहते है। एक विषय से अन्य विषय की प्…
- Verses 18–19अधिष्ठान के अनुरूप ही यह अध्यास है, ऐसा कहते हैं। जैसे यह परमपद है वैसा ही यह सत्असत्रूप…
- Verses 20–22इससे निर्विषय चिन्मात्र से अतिरिक्त जगत्ता नहीं है यह सिद्ध हुआ, ऐसा कहते हैँ । संवित् क…
- Verse 23इसी अभिप्राय से मैंने बार-बार निर्विषय विस्तृत अपरोक्ष चैतन्य की सर्वसाधारण प्रसिद्धि के…
- Verse 24आदि सृष्टि से ही दृश्य उत्पन्न नहीं हुआ | जो यहाँ प्रतीत होता है वह मायारूपी ऐन्द्रजालिक…
- Verse 25खेद है, जो दृश्य है ही नहीं वह अस्तिरूप से स्थित है। जो परम ब्रह्म है उसकी नास्ति है इससे…
- Verse 26में तो ब्रह्मभाव से शून्य अतएव विपरीत जगत् को कहाँ पाऊँ । मूढ जनता ने असत् दृश्य को सत्…
- Verse 27तो कभी कुछ उत्पन्न हुआ है ओर न उसका भान ही होता है । जो यह स्फुरित होता है वह स्वयं चिदाक…
- Verse 28जैसे मणि अपने से अभिन्न अपनी आभा से स्फुरित होती है वैसे ही चिदाकाश अपने से अभिन्न सृष्टि…
- Verse 29यह कैसे जाना जाय यह यदि कहो तो सूर्य आदि जगत् का सद्रूप से ही सत्सामान्य के प्रायः एकदेश…
- Verse 30जैसे सूर्य आदि का प्रकाश ब्रह्म के अधीन है वैसे स्वप्रकाश ब्रह्म सूर्य आदि के अधीन प्रकाश…
- Verse 31अहो ! यह दुश्यमण्डल उसकी प्रभा से भासित होता है । वह सब चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि आदि पदार्थ…
- Verse 32वह साकार है, निराकार है इस तरह की शब्दार्थ-कल्पना, जो आकाश कुसुम के समान असद्रूप है, तत्त…
- Verses 33–37जगत् को देख रहे जीवभूत इस सूर्य के तेज में उसी का अंगभूत परमाणु जैसे झरोखे आदि में भासता…
- Verses 38–46इस चितप्रकाश में कुछ है कुछ नहीं है, न किंचित् हे ओर न किंचन है यानी किंचित्, अकिंचित्…
- Verse 47यदि कोई कहे पृथ्वी आदि पदार्थ चिद्रूप ही हैं चिद्रूप से अतिरिक्त नहीं हैं तो अन्तयमिीरूप…
- Verses 48–49तब उनका तात्पर्य किसमें है ? ऐसा प्रश्न होने पर कहते हैँ । आदि सृष्टि से ही एकमात्र चिन्म…
- Verse 50प्रबोधकाल में जिस तरह का शुद्ध आत्मा शेष रहता है, उसको स्वीकार करने से जो जो जगत्- कौतुक…
- Verses 51–55में भी अद्वैतनिष्ठ, दुःख में भी सुख स्थितिवाले, बाहर संसार में रहते भी मुक्त होने के कारण…
- Verse 56जो अज्ञानावरणशून्य विद्वान् है उसका अन्तःकरण सदा समाधिसुख का अनुभव करता हे, यह शत्रु हे,…