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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, Verses 8–15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, verses 8–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 172 · श्लोक 8-15

संस्कृत श्लोक

यथा संकल्पशैलस्य दृश्यमानमपि स्फुटम् । पृथ्व्यादिरहितं रूपं तद्विराड्वपुषस्तथा ॥ ८ ॥ स्मृतिश्च संभवत्येव न कदाचन काचन । एषा लौकिकबुद्ध्या या सा सद्बुद्ध्या न विद्यते ॥ ९ ॥ श्रीराम उवाच । कथं न संभवत्येषां स्मृतिः स्मृतिमतां वर । स्मृतेश्चासंभवे कस्माद्गुणो गुणगणाकर ॥ १० ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । दृश्ये हि संभवत्येषा कार्यकारणतात्मनि । तद्भावाभावसंपन्ना न तु संभवति स्मृतिः ॥ ११ ॥ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं दृश्यं किंचिन्न विद्यते । यत्र तत्र कथं कीदृक् कुतः स्यात्संभवः स्मृतेः ॥ १२ ॥ भूत्वा भावे हि दृश्यस्य स्मरणं स्मृतिरुच्यते । दृश्यमेव न यत्रास्ति तत्रैताः कलनाः कुतः ॥ १३ ॥ अत्यन्ताभाव एवास्य दृश्यस्य किल सर्वदा । सर्वं ब्रह्मेति सत्यार्थास्तत्स्मृतेः कलनाः कुतः ॥ १४ ॥ स्मृतिर्न संभवत्येव तस्मादाद्या प्रजापतेः । आकारवत्त्वमेवास्य शुद्धज्ञानात्मनः कुतः ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे स्वच्छ (निर्मल) चिन्मात्र निर्विकार अपने स्वरूप का त्याग न करता हुआ आत्मा ही सुषुप्ति से स्वप्न में जाता हुआ अनवस्थिति को (अन्यरूप के समान स्थिति को) प्राप्त होता है वैसे ही सृष्टि के आदि में चिदाकाशरूप आत्मा ही अपने से अपने में चिदाभासरूप दृश्यसा स्फुरित होता है यानी आत्मा का सुषुप्ति से स्वप्न में गमन की नाई प्रलय से सृष्टि मे गमन भी समझना चाहिये । जैसे संकल्प से मन्द हुआ मन मनोरथ आदि में नगर के रूप से स्फुरित होता है वैसे ही चिदाकाशरूप परमात्मा सृष्टि के आदि में दृश्य-सा स्फुरित होता हे । जैसे वायु स्पन्दरूप होता हुआ अपने में ही आँधी, बवंडर आदि की तरह चेष्टा करता है वैसे ही चिदाकाश अज्ञात होकर अपने में ही दृश्यरूप से स्थित होता है । अतएव यदि वह ज्ञात हो जाय तो त्रिजगत्रूप दृश्य कदापि भासित न हो, अपने स्वरूप में इस प्रकार (जगत्‌ के रूप से) स्थित केवल परम ब्रह्म का ही भान हो । मूर्त पृथिवी आदि का अस्तित्व किंचिन्मात्र भी त्रिकाल में भी है ही नहीं । चाहे वह अज्ञानी की दृष्टि में मूर्तं अथवा ज्ञानी की दृष्टि में अमूर्त हो, वास्तव में ब्रह्म ही उस तरह से (दृश्यरूप से) विराजमान है । जैसे जागरण के समय में (जाग्रत्काल मेँ) स्वप्न का पहाड़ निःस्वरूप आकाश ही है यानी शून्य ही है वैसे ही प्रबोधकाल में (आत्मज्ञानकाल में) यह त्रिजगत्‌ शान्त चिन्मात्र आकाश ही हे । प्रबुद्ध पुरुषों की दृष्टि में यह जगत्‌ अखण्ड परम ब्रह्म ही हे । हम लोग विचार करने पर भी यह अप्रबोध (अज्ञानरूप दृश्य) केसा हे यह नहीं जानते