Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, Verse 29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 172 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
तद्वत्स्मृतिपदार्थस्य किं भ्रमस्य विचार्यते ।
दृश्यस्यासंभवाज्ज्ञस्य स्मृतिर्नास्त्वेव तत्त्वतः ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
यह कैसे जाना जाय यह यदि कहो तो सूर्य आदि जगत् का सद्रूप से ही सत्सामान्य के प्रायः
एकदेशरूप से (अंगरूप से) सबको अनुभव होता है, ऐसा कहते है।
उसी शान्त पद में यह भगवान् सूर्य तपते हैँ ओर उसी के अवयवभूत ही है । सूर्य उससे अतिरिक्त
कदापि नहीं हैं