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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, Verse 30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 172 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

स तथैकघनत्वाच्च चिद्व्योमत्वाज्जगत्स्थितेः । यथास्थितमिदं दृश्यमस्त्येवाज्ञस्य संप्रति ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे सूर्य आदि का प्रकाश ब्रह्म के अधीन है वैसे स्वप्रकाश ब्रह्म सूर्य आदि के अधीन प्रकाशवाला नहीं है, ऐसा कहते है । उस परमपद में स्थित होकर भी न सूर्य प्रकाश करता है और न चन्द्रमा ही प्रकाश करता है यह देव (देदीप्यमान) चिदाकाश सूर्य को प्रकाशित करता है, सूर्य उस ईश्वर को प्रकाशित नही करता हे । इस विषय में भगवती श्रुति है -*न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ।” अर्थात्‌ उस परम पद में न सूर्य का प्रकाश है, न चन्द्रमा और सितारों का, ये बिजलियाँ भी वहाँ प्रकाश नहीं करती हैं, इस अग्नि का तो भान कहाँ से होगा ? प्रकाशमान हो रहे उसके बाद ही सबका भान होता है उसकी आभा से इस सारे जगत्‌ का भान (प्रकाश) होता है