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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, Verses 1–3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, verses 1–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 172 · श्लोक 1-3

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । एवं पृथ्व्यादिरहितः खमेवाद्यः प्रजापतिः । मनोमात्रमहं मन्ये संकल्पविटपी यथा ॥ १ ॥ मन इत्यभिधानेन पश्चादास्था प्रकल्पिता । वार्यावर्तविवर्तेन प्रोत्थायावर्तता यथा ॥ २ ॥ सत्तामात्रात्मनस्तस्य कुतो बुद्ध्यादयः किल । अविद्यमाने पृथ्व्यादौ खस्यानन्तस्य किं रजः ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, यह चिदाकाश का स्फुरण ही जगत्‌ के रूप से प्रतीत होता है । वास्तव में तो न जगत्‌ है, न जगत्‌ की आभा है, न शून्य ही है और न वृत्ति संवित्‌ ही हे । जैसे शून्यता आकाश से अतिरिक्त नहीं हे वैसे ही जो यह जगतूनामक चिदाकाश का भान है, यह अज्ञानी जनकी दृष्टि में चिदाकाश से भिन्न रूप से स्थित होने पर भी उससे (चिदाकाश से) भिन्न नहीं हे । निर्विषय ही चैतन्य जो एक विषय से अन्य विषय की प्राप्ति होने पर बीच में प्रसिद्ध है वही दृश्य के रूप से स्फुरित होता हे । यह दृश्य उससे अतिरिक्त नहीं है

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ सत्तरवाँ सर्ग समाप्त एक सौ इकहत्तरवाँ सर्ग जीवन्मुक्ति की सिद्धि तथा सकल संशयो की निवृत्ति के लिए फिर तत्त्वोपदेश द्वारा दृश्य का परिमार्जन करना |