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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, Verses 38–46

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, verses 38–46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 172 · श्लोक 38-46

संस्कृत श्लोक

चिद्व्योमैव परं सर्गपर्यायं स्वात्मनि स्थितम् । चिद्व्योमैवेत्थमाभातं न च्युतं सत्स्वरूपतः ॥ ३८ ॥ आत्मनात्मनि रूपं वा सद्रूपमिव संस्थितम् । सर्गादावेव कचिते मिथ्या कचदपि स्थितम् ॥ ३९ ॥ अतः कुतः क्वचिन्नाम हेयादेयादिभासनम् । नेदमाकारवत्किंचिन्नापि स्मृत्यात्मकं क्वचित् ॥ ४० ॥ कारणाभावतो भाति स्वरूपं परमात्मनः । आकारवत्त्वे यद्दुःखं भवेत्स्मृत्यां तदेव च ॥ ४१ ॥ द्वयमेतदसत्तस्माद्वन्धो नाम न विद्यते । चिद्व्योम्नि भूतव्योमाभे शून्य एव यथास्थितम् ॥ ४२ ॥ स्थितं स्वरूपमजहद्भुवनार्काचलादिकम् । यथास्थितोग्रदिक्कालं जगत्त्वं रूपमत्यजत् ॥ ४३ ॥ स्वमेवात्यजतो रूपं चिद्व्योम्न उदरे स्थितम् । स्वानुभूत्येकमात्रात्म प्रमातृस्वाप्नपत्तनम् ॥ ४४ ॥ अपृथ्व्यादि कुतस्तत्र किल पृथ्व्यादयो वद । तद्भाति केवलं शान्तं चिदाकाशं तथात्मनि ॥ ४५ ॥ सर्वादौ स्वप्नकाले च पृथ्व्यादेः संभवः कुतः । उद्भूयेव जगद्रूपाद्ब्रह्मसत्तात्मनात्मनि ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

इस चितप्रकाश में कुछ है कुछ नहीं है, न किंचित्‌ हे ओर न किंचन है यानी किंचित्‌, अकिंचित्‌ आदि कल्पना इस शुद्ध निर्विषय चिद्रूप से अत्यन्त दूर है । व्यवहारमात्र का निरास होने पर विरोध और अविरोध का भी उसमे निरास हो गया है, यह भाव हे । अखण्ड, निरवकाश, असीम, निरन्तर अपने रूप से अत्यन्त विस्तृत चिन्मात्र आकाशसत्ता ही निजरूप में जगत्‌ के नाम से स्थित है । एक यानी चैत्य को त्याग कर चुकी और अन्य चिन्मात्ररूप को प्राप्त न हुई चिति का जो निर्विषय रूप है नानात्मक इस जगत्‌ का भी वही रूप हे । नाना अद्वितीय यह चिदाकाश ही स्वप्न में जीव चैतन्य की भोति पंच महाभूत रूप से विस्तृत नानासा (भिन्नसा) होकर स्थित हे जैसे सुषुप्ति से स्वप्न में प्रवेश कर रहे जीव की सुषुप्ति मे स्थित चिति ही ज्यों की त्यों (बिना कोई अन्तर पड़े) स्वप्नता को प्राप्त होती हे वैसे ही चिति ही प्रलय से सर्गता को प्राप्त है । जैसी सुषुप्ति हे स्वप्न भी वैसा ही है, यह जाग्रत्‌ भी वैसा ही है और तुर्य भी वैसा ही है इससे सिद्ध हुआ कि जगत्‌ आकाशतुल्य हे । जाग्रत्‌, स्वप्न ओर सुषुप्ति सबके सब तुर्यरूप ही स्थित हे ।ब्रह्यवेत्ताओं के सम्प्रदाय के विषय मेँ निपट मूढ पामर पुरुष जिसे जगत्‌ के रूप से जानता है, उसे मैं नहीं जानता हूँ। जड यानी जगत्‌ ओर अजड यानी जीवरूप सकल पदार्थों के अन्दर स्थित होकर अन्तर्यामिता से दुर्लक्ष्य जगत्‌ को दशनिवाला मन, बुद्धि आदि से शून्य जो ईश्वर है वही शोधित जीव चैतन्य का पारमार्थिक रूप है | वे सब जगत्पदार्थ भी तन्मय है वे सद्रूप नहीं है । किन्तु वही जगत्‌ के आकार से स्थित हँ