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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, Verses 51–55

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, verses 51–55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 172 · श्लोक 51-55

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

में भी अद्वैतनिष्ठ, दुःख में भी सुख स्थितिवाले, बाहर संसार में रहते भी मुक्त होने के कारण उसमें नहीं ही रहनेवाले ज्ञानी के लिए कौन-सी वस्तु साध्य या हेय शेष रहती है ? बाहर के कार्य मे व्यवहार कर रहा भी तत्त्वज्ञ पुरुष हृदय से न कुछ त्याग करता है ओर न कुछ ग्रहण करता है, किन्तु अकार्य में (ब्रह्म में) ही स्थित रहता है । जैसे हिम की शीतलता हे ओर अग्नि की उष्णता है वैसे ही इस तरह का उसका स्वभाव ही हो जाता है वह उसका प्रयत्न द्वारा संपादनीय गुण नहीं हे । किन्तु जिसका ऐसा स्वभाव न हो वह तत्त्वज्ञानी नहीं हे । आत्मा से अतिरिक्त विषय की इच्छा होना ही अज्ञता का लक्षण हे