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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, Verses 33–37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, verses 33–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 172 · श्लोक 33-37

संस्कृत श्लोक

अज्ञस्थो निश्चयोऽस्माकं न कदाचन गोचरः । यच्च यद्विषये नास्ति तन्नैवानुभवत्यसौ ॥ ३३ ॥ रजन्यनुभवो भानोर्भवत्यङ्ग कथं वद । भातं वस्तुस्वरूपात्म चिन्मात्रे किंचिदेव यत् ॥ ३४ ॥ तदभ्यस्तार्थसादृश्यात्तत्संस्कार इति स्मृतम् । आत्मस्वभावभूतानामपि चिद्व्योमरूपिणाम् ॥ ३५ ॥ सर्वेषां परिकल्प्यानामाभासेऽप्यनवस्थितेः । एवं न संभवत्येव जगत्किंचित्कदाचन ॥ ३६ ॥ दृष्टं मृगतृषेवाम्बु न तु तत्परमार्थतः । यदा त्वयं तदा स्वप्ने सर्गादौ चावभासते ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

जगत्‌ को देख रहे जीवभूत इस सूर्य के तेज में उसी का अंगभूत परमाणु जैसे झरोखे आदि में भासता हे वैसे ही असीम चित्प्रकाशवाले ब्रह्म में ये सूर्य आदि परमाणु भासते हैं अथवा नहीं भी भासते। जो सूर्य आदि से संयुक्त सृष्टियाँ चिन्मात्रआकाशरूप महारत्न की दीप्तियाँ हैं, जरा कहिये तो वे उससे व्यतिरिक्त कैसे होगी ? रत्न से उसकी कान्ति कदाचित्‌ भिन्न नहीं हो सकती, यह सर्वत्र पूर्णं होने के कारण शून्यता से भी रहित, सकल पदार्थो के सिद्ध होने के कारण सबसे रिक्त, कल्पित सब पदार्थो का अधिष्ठान होने के कारण सब पदार्थों से युक्त हे । उस चिद्रूप परमपद में कल्पित पृथिवी आदि सभी भूत-भोतिक पदार्थ हैं ही पर वास्तव में कोई भी नहीं हे । उसमें कल्पित चिदाभासरूप से निखिल जीव जीवित रहते हुए भी वास्तव में स्वरूप से कोई नहीं हैं । उस चित्प्रकाश में दो अवयवो के संगठन से उत्पन्न स्थूलता का त्याग न करते हुए ही ये सूर्य आदि परमाणु ही (निरवयव अणु ही) है । यथार्थ में स्वसत्ता का त्याग न करता हुआ द्वैत अथवा अद्वैत (एकत्व) इस चिद्रूप में कुछ नहीं हे