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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 166

एक सौ चौसठवाँ सर्ग समाप्त एक सौ पैंसठवाँ सर्ग॑ परस्पर में प्रवेश और परस्पर से उत्पन्न होने से जगत्‌ की चिन्मात्रता सुदृढ़ करने के लिए जाग्रत्‌ ओर स्वप्न की एकता का कथन |

15 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, जाग्रत्‌, स्वप्न और सुषुप्ति ये आपस में एक दू…
  2. Verse 2परस्पर में प्रवेश की तरह इनमें परस्पर निमित्तता भी है, ऐसा कहते हैं। स्वप्न जाग्रत में प्…
  3. Verse 3इनमें (स्वप्न ओर जाग्रत्‌ में) परस्पर व्यपदेशसंकरता भी दिखाई देती है, ऐसा कहते है । जाग्र…
  4. Verse 4स्वप्न भी जाग्रत्‌ यहाँ जाग्रत्‌ के जगत्‌ की तरह अनुभव से जाग्रत्‌ ही हे स्वप्न कदापि नही…
  5. Verse 5स्वप्न की जो स्वल्पकालता है ओर जग्रत्‌ की जो दीर्घकालता है वह परस्पर में परस्पर का प्रवेश…
  6. Verse 6इस प्रकार परस्परसंकरता होनेपर जो सिद्ध हुआ, उसे कहते हैं। इसलिए जाग्रत्‌ ओर स्वप्न में कद…
  7. Verse 7यदि कोई कहे स्वप्न प्रबोधकाल मे निवृत्त हो जाता है और स्वप्न पदार्थ भी जाग्रतकाल में शून्…
  8. Verse 8यदि कोई कहे आज के स्वप्न पदार्थ कल के स्वप्न में असत्‌ ही हैँ लेकिन आज के जाग्रत्पदार्थ क…
  9. Verse 9ऐसी परिस्थिति में आज के इस स्वप्न में, जो जीवन आदि सकल स्वाप्नपदार्थों से शून्य होनेपर भी…
  10. Verse 10जैसे स्वप्न में तीनों जगत्‌ केवल चितूचमत्काररूप ही हैं वैसे ही सृष्टि से लेकर ही त्रिजगत्…
  11. Verses 11–12की भति निराकारता ओर असत्यता स्पष्ट है, ऐसा कहते हैं। विपुल कलेवर (विस्तीर्ण) दिखाई देनेवा…
  12. Verses 13–14चिदाकाश में जो यह जगत्‌ स्फुरित होता है यह सूर्य आदि के तेज की प्रभा के समान चिदाकाश का स…
  13. Verse 15यह मिथ्या (असत्यस्वरूप) भ्रान्ति, जिसका शरीर केवल भ्रान्तिमात्र है, सत्य वस्तु की नाई साम…
  14. Verse 16ग्रहीता (ग्रहण करनेवाला), ग्रहण और ग्राह्यरूप जगत्‌ असत्‌ ही हे । उक्त जगत्‌ अधिष्ठान सत्…
  15. Verses 17–40अज्ञानवश एक पक्ष में अभिमानभ्रान्ति होती है । इस समय इसका तत्त्व आपको यथार्थरूप से ज्ञात…