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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 166, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 166, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 166 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

आत्मैवेदं जगत्सर्वं ख्यातिर्यत्र न किंचन । अख्यातो नाम न ख्यात्या कदाचित्ख्यापितः क्वचित् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वप्न की जो स्वल्पकालता है ओर जग्रत्‌ की जो दीर्घकालता है वह परस्पर में परस्पर का प्रवेश होनेपर विपरीत हो जाती है, यह कहते है । सदा ही जाग्रत्‌ में स्वप्नकाल लघुकालात्मक है और वैसे ही स्वप्नकाल मेँ जाग्रत्‌ सदा ही लघुकालात्मक हे