Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 166, Verses 11–12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 166, verses 11–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 166 · श्लोक 11,12
संस्कृत श्लोक
तत्रेदं महदाख्यानं श्रृणु श्रवणभूषणम् ।
दूषणं द्वैतदृष्टीनां द्योतनं बोधभास्वतः ॥ ११ ॥
अस्ति योजनकोटीनां सहस्राणि प्रमाणतः ।
आनीलकुड्यकठिना विमला विपुला शिला ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
की भति निराकारता ओर असत्यता स्पष्ट है, ऐसा कहते हैं।
विपुल कलेवर (विस्तीर्ण) दिखाई देनेवाले जाग्रत् पदार्थ असत्यभूत ही हैं, वास्तव में जैसे स्वाप्न
पृथिवी में आकारवत्ता नहीं हे वैसे ही जाग्रत् मेँ भी यह आकारवत्ता है ही नहीं । जैसे स्वप्न मेँ नानारूप
से देदीप्यमान होनेपर भी जगत् (स्वाप्न जगत्) शून्य ही है वैसे ही जाग्रत् में भी यह सारा जगत्
चिदात्मक आकाश ही है