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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 166, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 166, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 166 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

न वहन्तीह सरितो नेहोन्मज्जनमज्जने । व्योम व्योम्न्येव चिद्रूपं कचत्येवमनिङ्गितम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

इनमें (स्वप्न ओर जाग्रत्‌ में) परस्पर व्यपदेशसंकरता भी दिखाई देती है, ऐसा कहते है । जाग्रतस्वप्नवान्‌ पुरुष जाग्रत्‌ को ही "स्वप्न" कहता है ओर स्वप्नजाग्रत्‌ पुरुष स्वप्न को ही "जाग्रत्‌ कहता है यों जाग्रत्‌ में स्वप्न का व्यपदेश और स्वप्न में जाग्रत्‌ का व्यपदेश दिखाई देता हे । अतः इन दोनों मे व्यपदेशसांकर्य स्पष्ट है