Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 166, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 166, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 166 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
आदिसर्गात्प्रभृत्येव चिद्व्योमैवेत्थमाततम् ।
कचत्यात्मनि यत्तस्य बुद्धा तेनैव सर्गता ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
परस्पर में प्रवेश की तरह इनमें परस्पर निमित्तता भी है, ऐसा कहते हैं।
स्वप्न जाग्रत में प्रवेश करता है और जाग्रत् स्वप्न से निकलता हे । इसलिए आत्मा स्वप्नरूपी ही
जाग्रत से जागकर जाग्रत्रूप स्वप्न में ही प्रवेश करता है