Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 166, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 166, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 166 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
अख्यातिरन्यथाख्यातिरसत्ख्यातिरितीतरा ।
दृश्याश्चिन्मात्ररूपस्य भासश्चित्त्वचमत्कृताः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे स्वप्न प्रबोधकाल मे निवृत्त हो जाता है और स्वप्न पदार्थ भी जाग्रतकाल में शून्य हो
जाते हैं, लेकिन जाग्रत् इस प्रकार निवृत्त नहीं होता और न जाग्रत् पदार्थ असत् दिखाई देते हैं यों
जाग्रत् में स्वप्नवैधर्म्य की शंका का निराकरण करते हैं।
यह अतिभास्वर जाग्रद्रूप स्वप्न मृत्यु के समय परलोक के उदय काल में ओर आत्यन्तिक
द्वैतनिवृत्तिरूप स्वप्नपदार्थ-बोधकाल में ओर सुषुप्तिकाल में भी शून्य ही रहता है, इसलिए जाग्रत् का
स्वप्न के साथ साधर्म्य ही हे, वैधर्म्य नहीं हे