Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 157
एक सौ पचपनवाँ सर्ग समाप्त एक सौ छप्पनवाँ सर्ग वायु में स्थित व्याध का जीव राजा सिन्धु बनकर विदूरथ को मारकर अपने मन्त्री के मुँह से अपना तत्त्व सुनेगा, यह वर्णन ।
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- Verse 1देह का त्यागकर प्राणयुक्त वायु से भी सूक्ष्म तुम्हारा जीव वायु की तरह उस महाकाश में रहेगा…
- Verses 2–15मुनिजी ने कहा : हे सौम्य, तुम्हारे उस विशाल शरीर के विनष्ट होनेपर उस अव्याकृत आकाश में तु…
- Verses 16–19तुम कहोगे : हे मन्त्रिवर, मे धनवान् हूँ ओर प्रलयकाल के समुद्र के समान मुझमें बल है, ऐसी…
- Verses 20–21राजा सिन्धु कहेगा : मन्त्रिवर, तुमने बहुत उचित कहा । यदि ऐसा है तो विदूरथ को परास्त करना…
- Verses 22–23मन्त्री कहेगा : हे कमलनयन, कभी भी खेद को न प्राप्त होनेवाले उसने सदा भगवती देवी की यही प्…
- Verse 24सिन्धु कहेगा : मन्त्रिवर, यदि ऐसा है तो मैं भी सदा ही देवी की पूजा करता हू । फिर वह परमेश…
- Verses 25–27मन्त्री कहेगा : महाराज, वैखरीपर्यन्त सब शब्दों की बीजभूत संविद्रूप भगवती सदा सबके हृदय के…
- Verse 28राजा सिन्धु कहेगा : मेरी तरह विदूरथ ने भी राज्य के लिए शुद्ध संविद्रूप उसकी प्रार्थना क्य…
- Verse 29आपकी स्वेच्छानुसारिणी प्रवृत्ति के विषय में मेरे प्रति यह प्रश्न उचित नहीं है, ऐसी आशंका…
- Verse 30मन्त्री कहेगा : हे प्रभो, शत्रुनाश करनेवाले महाराज का पूर्वजन्म का अशुभ अभ्यास है, इसलिए…
- Verse 31देवता स्वतन्त्ररूप से अनुग्रह नहीं करते, किन्तु भक्त की चित्तवृत्ति के अनुसार ही अनुग्रह…
- Verses 32–36चाहे वह राज्य हो, चाहे मोक्ष हो, चाहे अन्य कुछ हो दृढ़अभ्यास बनाकर जानता है वह सत् हो, च…