Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 157, Verses 20–21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 157, verses 20–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 157 · श्लोक 20,21
संस्कृत श्लोक
वर्तमाने भवे भव्यगुणैर्मुक्ता तु मानद ।
केवला राजसी प्रोक्ता जातिः स्वल्पभवे भवेत् ॥ २० ॥
प्रथमात्यन्तबहुभिर्भवैश्चेऽन्मोक्षगामिनी ।
जातिस्तत्प्रोच्यते तज्ज्ञैः सद्भिस्तामसतामसी ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
राजा सिन्धु कहेगा :
मन्त्रिवर, तुमने बहुत उचित कहा । यदि ऐसा है तो विदूरथ को परास्त करना मुश्किल ही था, अतः
युद्ध में जो वह मारा गया यह तो बड़ा ही आश्चर्य का विषय ह । इस प्रकार के भगवती देवी के प्रसाद
से युक्त राजा विदूरथ उस युद्ध में क्यों विजयी नहीं हुआ ?