Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 157, Verses 22–23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 157, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 157 · श्लोक 22,23
संस्कृत श्लोक
सामान्येनैव बहुभिर्जन्मभिर्मोक्षभागिनी ।
केवला तामसी प्रोक्ता जातिर्जातिविशारदैः ॥ २२ ॥
क्रमेणानेन जातीनां विविधा भेदकल्पना ।
तासां तामसतामस्यां जातौ जातोऽसि मानद ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
मन्त्री कहेगा : हे कमलनयन, कभी भी खेद को न प्राप्त होनेवाले उसने सदा भगवती देवी की
यही प्रार्थना की थी कि संसार से मेरा मोक्ष हो । इस कारण सत्य संकल्पवाली भगवती सरस्वती ने
उसे मोक्ष दिया, अतएव उसने युद्ध में स्वयं पराजय का वरण किया