Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 157, Verses 2–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 157, verses 2–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 157 · श्लोक 2-15
संस्कृत श्लोक
मन्त्री वदिष्यति ।
रहस्यं शृणु भो राजन्सावधानपरः क्षणम् ।
चोदितः संदधासीदमद्य मान्द्यविनाशनम् ॥ २ ॥
किमप्याद्यन्तरहितमस्तीह सदनामयम् ।
स्थितं त्वमहमित्यादिरूपेण ब्रह्मशब्दितम् ॥ ३ ॥
तद्ब्रह्म स्वयमेवाहं चिच्चेतामीति संविदम् ।
जीवतामिव गत्वास्ते चित्तीभूयात्यजद्वपुः ॥ ४ ॥
चित्तं तु गगनाच्छात्म वपुर्विद्ध्यातिवाहिकम् ।
तदेव वास्ति नेहान्यदाधिभौतिकतादिकम् ॥ ५ ॥
चित्तमेतदनाकारमपि साकारवत्स्थितम् ।
संकल्पैः परलोकाद्यैः स्वप्नाद्यैरेतदेव सत् ॥ ६ ॥
अनाकारमपि स्फारं चित्तं जगदिदं विदुः ।
य एव पवनो नाम स एव स्पन्द्नं यथा ॥ ७ ॥
यथा गगनशून्यत्वे जगच्चित्ते तथेककम् ।
अत्राप्रतिघरूपेऽस्ति न मनागपि भिन्नता ॥ ८ ॥
हृदयस्थं जगज्जालं न किंचित्किंचिदास्थितम् ।
जगद्विद्धि निराकारं चित्तमेव न वास्तवम् ॥ ९ ॥
सत्त्वमेव वपुः पूर्वमुदितं ब्रह्मणः पदात् ।
अयमेव स संपन्नो योऽद्य तामसतामसः ॥ १० ॥
सिन्धुर्वक्ष्यति ।
किमुच्यते महाभाग वद तामसतामसः ।
क्रियन्ते पूर्वमेवैताः केन संज्ञाः परे पदे ॥ ११ ॥
मन्त्री वदिष्यति ।
जन्तोः सावयवस्येह हस्ताद्यवयवा यथा ।
तथा नवयवस्यैवमातिवाहिकतात्मनः ॥ १२ ॥
पश्चादात्मनि सैवात्मा नानासंज्ञाः करिष्यति ।
आधिभौतिकतानाम्नि पृथ्व्याद्या आतिवाहिके ॥ १३ ॥
स्वप्नाभेऽस्मिञ्जगद्भाने संकल्पेनात्मरूपिणा ।
संज्ञात्मनात्मरूपेण स्वयं व्यवहरिष्यति ॥ १४ ॥
त्वामातिवाहिकाकारा यत्तत्स्फुरितवान्नवम् ।
जातिर्महातमस्कोऽयमिति तत्राभिधा कृता ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
मुनिजी ने कहा : हे सौम्य, तुम्हारे उस
विशाल शरीर के विनष्ट होनेपर उस अव्याकृत आकाश में तुम्हारा क्या होगा, यह तुम ध्यान देकर
सुनो । उक्त शरीर के नीचे गिरनेपर प्राणयुक्त तुम्हारा जीव उस अत्यन्त विशाल अव्याकृताकाश
में वायु का लेशरूप होगा । उसी वायु के लेश में तुम्हारा चित्त हृदयस्थ (वासनामय) सामने स्थित
विशाल भूतल आदि जगत् को वैसे ही देखेगा जैसे कि तुम स्वप्न में देखते हो । तदनन्तर महती
चित्तवृति (महामना) होने के कारण या चित्तवृत्ति के ही जगत् के आकार से महान् होने के कारण
तुम्हारा जीव वहाँपर भें राजा हू यह देखेगा, इस प्रकार भूतल में संकल्पित अर्थ का भागी होगा।
वहाँपर उसकी एकाएक शीघ्र ऐसी प्रतिभा अपने आप उदित होगी कि मैं सामन्तो द्वारा अत्यन्त
सत्कृत श्रीमान् सिन्धुनाम का राजा ह । पिताजी तपस्या करने के लिए जब वन को चले गये तब
पिता द्वारा दिया गया चार समुद्रवाली पृथिवी का राज्य आठ वर्ष की अवस्थावाले मुझे प्राप्त हुआ।
सीमा के अन्त में विदूरथ नाम से प्रसिद्ध राजा मेरा शत्रु है। जिसे बिना प्रबल प्रयत्न के परास्त
करना कठिन है। यह राज्य करते मेरे सौ वर्ष बीत गये हैं। अहा मैंने अपने स्त्री-पुत्र नौकर-चाकरों
के साथ खूब सुख -भोग किया | दुःख है, यह मेरे सीमान्त का राजा कोष, बल आदि में बढ़ा-चढ़ा
है इसके साथ मेरा घोर संग्राम उपस्थित है । यह चिन्तन कर रहे तुम्हारा वहाँपर राजा विदूरथ के
साथ चतुरंगिणी सेना का विनाश करनेवाला तुमुल युद्ध होगा तुम रथरहित होते हुए भी तलवार
से विदूरथ की जंघाओं को काटकर उसे महान् युद्ध द्वारा धराशायी करोगे । तदनन्तर चार सागरों
से परिवृत्त भूतलपर तुम्हारा निष्कंटक राज्य होगा, लोकपाल भी भयभीत होकर तुम्हारे शासन का
आदर करेगे । वह तुम सिन्धु नामक राजा बनकर सकल भूमण्डल को स्वायत्त कर पंडित और
मन्त्रियों के साथ निम्न लिखित कथाएँ करोगे । मन्त्री कहेगा : महाराज, यह अत्यन्त आश्चर्य की
बात है जो महाराज ने विदूरथ को युद्ध मे यो परास्त किया ओर यमलोक पर्हैवाया