Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 157, Verses 16–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 157, verses 16–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 157 · श्लोक 16-19
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मणो निर्विकारस्य विकारिण इव प्रभो ।
जातयो जीवतापत्तौ कलिता विविधाभिधाः ॥ १६ ॥
प्राथम्येनैव यद्ब्रह्म जीवतामिव गच्छति ।
तदैव बुद्ध्या भोक्ता तज्जातिः सात्त्विकसात्त्विकी ॥ १७ ॥
वर्तमाने भवे भव्यगुणैर्युक्ता तु मानद ।
केवला सात्त्विकी प्रोक्ता जातिर्जातिविदां वरैः ॥ १८ ॥
नवा भवैश्चेद्बहुभिर्भोगमोक्षैकभागिनी ।
जातिस्तत्प्रोच्यते तज्ज्ञैः सद्भी राजसराजसी ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
तुम
कहोगे : हे मन्त्रिवर, मे धनवान् हूँ ओर प्रलयकाल के समुद्र के समान मुझमें बल है, ऐसी अवस्था
में भला बताओ तो शत्रु राजा विदूरथ मेरे लिए क्यों अजेय होगा । मन्त्री कहेगा : महाराज, उसकी
लीला नामकी पत्नी है उसने घोर तपस्या द्वारा निर्विकार जगन्माता देवी सरस्वती को अपनी माँ के
रूप से स्वीकार किया है । भुवनो को पैदा करनेवाली देवी सरस्वती पुत्री के रूप से स्वीकृत लीला
के मोक्ष आदि महान् कार्यो को भी अनायास क्रीडा से ही सिद्ध कर देती हे । वह भगवती देवी केवल
शाब्दिक वर से ही जगत् को भी क्षणभर में अजगत् बना डालती हैं आपका विनाश (तिरस्कार)
करने में भला उन्हें क्या क्लेशरूप असामर्थ्य हो सकती है