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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 157, Verses 25–27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 157, verses 25–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 157 · श्लोक 25-27

संस्कृत श्लोक

विशेषेण त्वनेनैव व्यर्थं कालोऽतिवाहितः । महाशवशरीरेण त्वयानन्तखगामिना ॥ २५ ॥ एवं तामसतामस्या जात्यासि जनितो यदा । तदा दुर्लभमोक्षस्त्वं संसारकुहरादिति ॥ २६ ॥ सिन्धुर्वदिष्यति । आर्योदाहर केनैषा प्राग्जातिर्जीयतेऽधमा । यावत्तथैव तिष्ठामि स्याच्चेत्तद्वद पावनम् ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

मन्त्री कहेगा : महाराज, वैखरीपर्यन्त सब शब्दों की बीजभूत संविद्रूप भगवती सदा सबके हृदय के अन्दर रहती है वही सरस्वती कही गई हे । आत्महितैषिणी उक्त भगवती की जो जो जैसी प्रार्थना करता है, उसके लिए वह स्वयं ही वैसा वर प्रदान करती है । उस वरप्रदान से उसकी सत्यसंकल्पवती चिति ही वर-फल के रूपसे अनुभूत होती है । हे शत्रुतापन, आपने मोक्ष के लिए उसकी प्रार्थना नहीं की, किन्तु आपने आत्महितैषिणी संविद्रूप उक्त भगवती की शत्रुनाश के लिए प्रार्थना की है