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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 156

23 verse-groups

  1. Verses 1–10एक सौ चौवनवाँ सर्गं समाप्त एक सौ पचपनवाँ सर्ग व्याध की मूढ़ तपस्या से प्रसन्न भगवान्‌ के…
  2. Verse 11तपस्या करते हुए उसने किसी समय फिर उन मुनि महाराज से प्रश्न किया : हे मुने ! मेरी आत्मा मे…
  3. Verses 12–13हे व्याध, मैंने तुम्हें जिस ज्ञानका उपदेश दिया था, वह पुरानी लकड़ी के अन्दर स्थित थोड़ी-स…
  4. Verse 14हे व्याध, अब तुम निर्णय का वर्णन कर रहे मुझसे अपना यह भावी वृत्तान्त सुनो । वह कानों के ल…
  5. Verses 15–17प्रसन्न होकर देवताओं के साथ तुम्हारे समीप आयेंगे
  6. Verses 18–21हे श्रेष्ठ, तुम वर देनेवाले ब्रह्माजी के समक्ष अपनी सहज उद्दण्डतावश निज मनोरथ से कल्पित स…
  7. Verses 22–24हे देवाधिदेव, इस प्रकार की वस्तु का प्रत्यक्ष अनुभव करने के लिए यह निम्ननिर्दिष्ट वर आपसे…
  8. Verse 25हे परमेश्वर, इस प्रकार आकाश सहित इस असीम दृश्य का अन्त मुझे प्राप्त हो, यही परम वर मुझे म…
  9. Verse 26हे सज्जन, ऐसी जब तुम प्रार्थना करोगे तब देवाधिदेव प्रभु ऐसा ही हो यों तुम्हें वर देकर अन्…
  10. Verse 27स्वर्गाधिपति देवाधिदेव श्रीब्रह्माजी के देवताओं के साथ चले जानेपर तपस्या से कृश हुआ तुम्ह…
  11. Verses 28–42उसके बाद मुझसे पूछकर नमस्कार कर उसी समय दिव्यशरीरधारी तुम चित्त में स्थित त्रिलोक का अन्त…
  12. Verse 43महाकाश में निरन्तर बढ़ रहे अतएव विशालकाय हुए तुम रोक-टोक के बिना ही आधारभूत अनन्त आकाश मे…
  13. Verse 44सम्पूर्ण अवकाश को ढक चुके इस शरीर का मैं अवश्य त्याग करता हूँ। इस अतिविशाल कुशरीर से मैं…
  14. Verse 45असीम ओर-छोर रहित और आकाश में निराधार स्थित यह मेरा शरीर भी क्या है जिससे कि तत्त्वज्ञानिय…
  15. Verse 46ऐसा विचारकर तुम प्राणवायु को शरीर से बाहर निकालने वाली योगधारणा कर जैसे पक्षी खाये हुए फल…
  16. Verse 47शरीर का त्यागकर वायु से भी सूक्ष्म तुम्हारा जीव प्राणवायु से युक्त होकर वायु की तरह उस आक…
  17. Verse 48जिसके पंख कट चुके हों ऐसे महान्‌ मेरु की तरह तुम्हारा महान्‌ शरीर गिरेगा । भूलोक के पर्वत…
  18. Verse 49तव पूर्वोक्त रक्तरहित भगवती काली मातृमण्डल के साथ उस शरीर को पूर्ववर्णन के अनुसार गणोंसहि…
  19. Verse 50हे सुव्रत, इस तरह तुम सारा आत्मवृत्तान्त सुन चुके हो, तालीवन में तपस्याकर जैसा चाहते हो व…
  20. Verses 51–52आगे आनेवाले अपने दढसंकल्प-फलको सुनकर उससे खिन्न हुआ व्याध उसके प्रतीकार का कोई उपाय है, य…
  21. Verses 53–54मुनिजी ने कहा : हे व्याध, अवश्यंभावी अर्थ को कोई कदापि टाल नहीं सकता, क्योकि वह आधुनिक प्…
  22. Verse 55ज्योतिषशास्त्र आदि में उक्त उपायों से उसका ज्ञानभर हो सकता है उसको उलटना शास्त्रों की भी…
  23. Verse 56तब तो पूर्वजन्म के दृढ़संकल्पजनित कर्मो के अनन्त होने से कदापि मोक्ष नहीं होगा ? इस आशंका…