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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 156, Verses 22–24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 156, verses 22–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 156 · श्लोक 22-24

संस्कृत श्लोक

मन्त्री वदिष्यति । तेन संप्रार्थिता देवी सर्वकालमखेदिना । मोक्षोऽस्तु मम संसारादिति तामरसेक्षण ॥ २२ ॥ तया तेन विभो तस्य स एवावन्ध्यसंविदा । संपादितस्तेन तदाश्रित आजौ पराजयः ॥ २३ ॥ सिन्धुर्वदिष्यति । यद्येवं तन्मया देवी सदैवैषा प्रपूज्यते । मोक्षं किमिति मे नैषा ददाति परमेश्वरी ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

हे देवाधिदेव, इस प्रकार की वस्तु का प्रत्यक्ष अनुभव करने के लिए यह निम्ननिर्दिष्ट वर आपसे चाहता हूँ। हे विधे, उसे आप बिना किसी विघ्नवाधा के शीघ्रातिशीघ्र मुझे दीजिए यह मेरा शरीर चिरकाल तक निरोग रहे, इसकी मृत्यु स्वाधीन हो, यह गरुड के सदुश वेग से युक्त होकर आकाशगामी हो । इसका प्रत्येक अंग प्रतिक्षण एक योजन बढ़े, बढ़ते बढ़ते समय-क्रम से तीनों लोकों के बाहर जाय ओर आकाश के तुल्य विशालरूप हो