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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 156, Verses 51–52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 156, verses 51–52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 156 · श्लोक 51,52

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

आगे आनेवाले अपने दढसंकल्प-फलको सुनकर उससे खिन्न हुआ व्याध उसके प्रतीकार का कोई उपाय है, या नहीं यह पूछता है । व्याध ने कहा : हे भगवन्‌, क्या मुझे यह अक्षय दुःख अवश्य भोगना पड़ेगा ? हाय मैने क्लेश भोगने के लिए पुरुषार्थ के भ्रम से व्यर्थ दुःख का ही संकल्प द्वारा समर्थन किया । हे श्रेष्ठतम मुनिजी, यह भावी वस्तुस्थिति आपने मुझसे कही । यह भवितव्यता जिस युक्ति से टल जाय वैसी भी कोई युक्तिहे या नहीं है, कृपया यह मुझसे कहिये