Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 156, Verses 12–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 156, verses 12–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 156 · श्लोक 12,13
संस्कृत श्लोक
महता तेन युद्धेन हनिष्यसि विदूरथम् ।
करवाललतालूनजङ्घं त्वं विरथोऽपि सन् ॥ १२ ॥
चतुःसागरपर्यन्ते भूतले भूपतिस्ततः ।
भविष्यसि भयाक्रान्तदिक्पालादृतशासनः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे व्याध, मैंने तुम्हें जिस ज्ञानका उपदेश दिया था, वह पुरानी लकड़ी के अन्दर स्थित थोड़ी-सी आग
के समान तुम्हारे हृदय में स्थित है। इस समय उसने जलाने के योग्य भी दृश्यरूप अनर्थपर आक्रमण
नहीं किया है। “जीर्ण लकड़ी के अन्दर स्थित थोड़ी-सी अग्नि के समान" इस कथन से जन्मान्तरमें
वह उद्बुद्ध होगा, यह सूचित किया है । अभ्यास न होने के कारण तुम कल्याणकारी तत्त्वज्ञान में
विश्रान्त नहीं हुए हो । किन्तु अभ्यास से समय आनेपर तुम पूर्णरूप से ज्ञान में विश्रान्ति को प्राप्त
होओगे