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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 156, Verses 18–21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 156, verses 18–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 156 · श्लोक 18-21

संस्कृत श्लोक

गृहीतायाः सुतात्वेन सास्या भुवनभाविनी । संसाधयति कार्याणि मोक्षादीन्यपि हेलया ॥ १८ ॥ वरेण शब्दमात्रेण जगदप्यजगत्क्षणात् । करोति सा भवन्नाशे तस्याः कैव कदर्थना ॥ १९ ॥ सिन्धुर्वदिष्यति । त्वया वै युक्तं कथितं यद्येवं तद्विदूरथः । अशक्यो जेतुमाश्चर्य एतस्य समरे वधः ॥ २० ॥ तदेवं संप्रसादेन भगवत्या समन्वितः । किमित्यस्मिन्रणे तस्मिञ्जयं राजा न लब्धवान् ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रेष्ठ, तुम वर देनेवाले ब्रह्माजी के समक्ष अपनी सहज उद्दण्डतावश निज मनोरथ से कल्पित संशयराशिरूप यह वर माँगोगे - “हे ब्रह्माजी, इस दृश्यरूप अविद्याभ्रम के ज्ञात होनेपर दर्पण के तुल्य स्थित ब्रह्म मे प्रतिबिम्बरूप मल से रहित कोई प्रदेश नहीं है, जहाँपर पहुँचकर मेरी विक्षेपशून्य स्थिति हो सके । चूँकि परमाणु के तुल्य अत्यन्त सूक्ष्म आकारवाले अन्दर स्थित इस चिदाकाशरूपी दर्पण में यत्र तत्र (सर्वत्र) यह जगद्रूप दृश्य प्रतिबिम्ब होता हे, अतएव इसमे प्रतिबिम्बरूप मल से रहित कोई प्रदेश नहीं है । हे ब्रह्माजी, अतः साविद्य (अविद्यासहित) चिति की यह स्थिति है, इसलिए यह अविद्याप्रयुक्त अनर्थकारी दृश्य कहाँतक (कितनी दूरीतक) होगा, उस दृश्य के बाद (परली पार) अनन्त निरविद्य (अविद्या रहित) ब्रह्म कितनी दूरी तक होगा, आकाश की तरह संसारशून्य उस ब्रह्म को मैं जाकर अवश्य ही देखूँगा