Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 156, Verses 1–10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 156, verses 1–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 156 · श्लोक 1-10
संस्कृत श्लोक
व्याध उवाच ।
अनन्तरं हे भगवन्वितताकाशवासिनः ।
किंभविष्यति मे तत्र देहेऽधःपातिनि क्षितौ ॥ १ ॥
मुनिरुवाच ।
शूणुष्वावहितस्तस्मिन्देहे तव परिक्षते ।
किं भविष्यति भव्यात्मस्तस्मिन्परमकाम्बरे ॥ २ ॥
देहे तस्मिन्परिभ्रष्टे जीवस्तु प्राणसंयुतः ।
भविष्यत्यम्बरे वातलवो व्याततरूपिणि ॥ ३ ॥
तस्मिन्वातलवे चेतो दृश्यं हृत्स्थं स्थितं पुरः ।
स्फारं द्रक्ष्यति भूपीठं भवान्स्वप्ने जगद्यथा ॥ ४ ॥
महत्त्वाच्चित्तवृत्तेस्तु जीवो द्रक्ष्यति ते ततः ।
राजाहमस्मि भूपीठ इति संकल्पितार्थभाक् ॥ ५ ॥
तत्रास्य सहसैवाशु प्रतिभोदेष्यति स्वयम् ।
अहमस्मि नृपः श्रीमान्सिन्धुर्नाम्नातिमानितः ॥ ६ ॥
अष्टवर्षाय मे राज्यं गते पितरि काननम् ।
भुवश्चतुःसमुद्रायाः पित्रा दत्तमुपागतम् ॥ ७ ॥
सीमान्ते भूपतिः शत्रुर्विदूरथ इति श्रुतः ।
विद्यते यः प्रयत्नेन विना नाम न जीयते ॥ ८ ॥
इदं मे कुर्वतो राज्यं संवत्सरशतं गतम् ।
अहो भृत्यकलत्रौघैः सह भुक्तं मया सुखम् ॥ ९ ॥
कष्टमेष प्रवृद्धो मे सीमान्तवसुधाधिपः ।
अनेन सह संग्रामो दारुणः समुपस्थितः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
एक सौ चौवनवाँ सर्गं समाप्त
एक सौ पचपनवाँ सर्ग
व्याध की मूढ़ तपस्या से प्रसन्न भगवान् के वरदान से आकाशगति, कायवृष्टि और मृत्यु का वर्णन ।
अग्निने कहा : हे वत्स, यह सुनकर वह व्याध उस समय उस वन में इसके पश्चात् चित्रलिखित की
तरह मारे आश्चर्य के स्तब्ध हो गया । अपने अभ्यास के बिना उसके चित्त को परमपद में विश्राम नहीं
मिला, अतः वह बेचारा मारे आश्चर्य के उद्भ्रान्त-सा समुद्र मे बहाया जा रहा-सा हो गया । वह चक्र में
चढ़ा हुआ-सा अथवा किसी सिद्ध द्वारा अपने तपोबलरूपी चक्रवात से (आँधी से) हरा गया-सा तथा
मगर द्वारा आक्रान्त-सा विवश हो गया, उसमें किरी प्रकार की शक्ति नहीं रह गई । क्या यह निर्वाण
होगा अथवा अन्य निर्वाण होगा ? इस सन्देह से उस मूर्ख को नवयोवनवान् के समान शान्ति नहीं
मिली । चूँकि यह जगत् अविद्या ही है, यह बात हृदय में भलीभाँति नहीं ठहरती है, इसलिए यह जगत्
अविद्या नामकी ब्रह्मशक्ति द्वारा उत्पादित सत्य ही है ऐसा चिन्तन करता हुआ मैं इस दृश्य का कहाँ
अवसान होगा यह बात तपस्या द्वारा शरीर प्राप्त कर, पृथ्वी से आरम्भ कर, दूर होने के कारण ऊँचे
शरीर से जाकर देखूँगा। भाव अभाव स्वरूप इस दृश्य के अवसान मेँ (असंसारप्रदेश में) मैं सुख-से रह
सकूँगा, इसलिए जहा पर आकाश भी नहीं है वहाँ मैं जाता हूँ। ऐसा हृदय में विचार कर वह कोरा मूर्ख ही
रहा। मुनिजी ने बड़े विस्तार के साथ अनेक दृष्टान्तों और उपपत्तियों से युक्त जो उपदेश दिया था,
वह अभ्यास के बिना भर्म में किये गये हवन के तुल्य व्यर्थ चला गया । उसके पश्चात् तभी से उक्त
निर्णयवश ही व्याधता को छोड़कर वह मुनियों के साथ तपस्या करने के लिए उद्यत हुआ। तपस्वियों के
लोक में तपस्वी लोगों में प्रसिद्ध भावनाओं से सदा तपस्वियों के साथ निवास करते हुए उसने अनेक
हजार वर्ष तक कठिन तपस्या की