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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 129

एक सौ सत्ताईसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ अद्जाईसवाँ सर्ग अन्धकारपूर्ण गड्ढे को तथा ब्रह्माण्ड के आवरणों को पारकर विपश्चितों का अविद्या में भ्रमण का वर्णन ।

29 verse-groups

  1. Verses 1–2यदि श्रीरामजी की ओर से यह आशंका हो कि ज्योतिश्चक्र तथा उसके विस्तार आदि का परिज्ञान आपको…
  2. Verse 3यदि श्रीरामजी कहें कि यदि अन्याय ब्रह्माण्डों का स्वरूपगठन विलक्षण है, तो उसे भी कहने की…
  3. Verse 4हे पण्डित लोगों, उस उत्सर्ग से सब ब्रह्माण्डों के मध्य में सब द्वीप और सागरों की उत्तर दि…
  4. Verses 5–6जो अवान्तर विशेष हैं, उनका वहाँ के रहनेवाले लोग ही प्रत्यक्ष करते हैं यहाँ के रहनेवालों क…
  5. Verses 7–8हे श्रीरामचन्द्रजी, अब आप प्रस्तुत विषय को सुनिये । ब्रह्माण्ड के दो खप्पर जिनका कि विस्त…
  6. Verse 9तव तो मेघो से गिरे हुए जलबिन्दु, ओले आदि समुद्र, नदी आदि में नहीं गिरेगे, कारण कि जल में…
  7. Verse 10पूर्वोक्त ब्रह्माण्ड के आवरणभूत जल से बाहर जल से दसगुना आकाश के समान देदीप्यामान इन्धनशून…
  8. Verses 11–12ब्रह्माण्डआवरणभूत तेज से बाहर दसगुना विस्तारयुक्त वायु स्थित है, वायु से बाहर दसगुना निर्…
  9. Verses 13–14आदि, मध्य और अन्त से (जन्म, स्थिति और विनाश से) शून्य महाचित्‌ नामवाले, सर्वत्मिक लोहघन क…
  10. Verse 15वह कौन कारण है, जो करोड़ों ब्रह्माण्ड को विकसित करता है ? इस प्रश्न पर कहते है । कचनरूपी…
  11. Verse 16प्रश्नों के उत्तर का उपसंहार कर अब प्रस्तुत विषय सुनाते है। हे श्रीरामचन्द्रजी, यह दृश्या…
  12. Verse 17खूब अभ्यस्त पूर्व संस्कार से (दिगन्तदर्शनउद्योग के संस्कार से) सम्पन्न उस प्रकार के सजीव…
  13. Verse 18वहाँपर उसने अपने देवशरीर को पर्वतशिखर के सदृश अत्यन्त महान्‌ गीध आदि द्वारा नोच-नोचकर खाय…
  14. Verse 19जहाँपर उसकी मृत्यु हुई थी, वह प्रदेश पुण्यमय था यानी स्थूल देह के विषय संस्कार के उद्बोधक…
  15. Verse 20उक्त विपश्चित्‌ जिसका ज्ञान स्थूलदेह से अतिरिक्त केवल आत्मा को विषय करता था, उससे अधिक स्…
  16. Verse 21देहविहीन चित्त बाहर कैसे जाता है ? देह के बिना चित्त का बाहर संचार स्वीकार करने पर भी पहल…
  17. Verse 22श्रीवस्तिष्ठजी उक्त प्रश्नों में से पहले प्रथम प्रश्न का उत्तर देते हैं। जैसे अन्तःपुर मे…
  18. Verse 23भ्रान्ति में , स्वप्न में, मनोरथ में, मिथ्या ज्ञान में तथा औपन्यासिक कथाओं के श्रवण में ज…
  19. Verse 24दूसरे प्रश्न का उत्तर देते हैं। जिस शरीर में भ्रम, स्वप्न, मनोराज्य आदि का प्रसार होता है…
  20. Verse 25कब आधिभोतिकता की निवृत्ति से आतिवाहिकता का शेष होता है, इस प्रश्नपर कहते हैं। विचार से सर…
  21. Verse 26आतिवाहिक शरीर की निवृत्ति से चिन्मात्र का शेष होने में भी विचार ही साधन है, इस आशय से कहत…
  22. Verse 27निर्विषय चिन्मात्र प्रसिद्धि का तो पहले अनेक बार वारण किया ही जा चुका है, इस आशय से पहले…
  23. Verses 28–31उसमें द्वैतरूपी विषय और विषयप्रयुक्त राग, द्वेष आदि का प्रसंग ही नहीं है, ऐसा कहते हैं। भ…
  24. Verse 32मनके मनन से शून्य शान्त जो अवस्थिति है वही उत्तम बोध है, आतिवाहिक देह में स्थित विपश्चित्…
  25. Verse 33उक्त जल को लँघकर उसके बाद वह सूर्यो के समूह की नाई भीषण प्रलयाग्नि की घनघोर ज्वालाओं के प…
  26. Verses 34–35तैजस आवरण में भ्रमण कर रहे उस विपश्चित्‌ ने दाह, शोक आदि से मुक्त मनोमय देह से उसके उत्तर…
  27. Verse 36उसका उक्त गमन प्रायः स्वप्न की कल्पना के तुल्य रहा वास्तविक नहीं रहा यह बुबुधे” पदका तात्…
  28. Verses 37–44आकाश को लाँघकर वह असीम अविद्याशबल ब्रह्माकाश में पहुँचा । जिसमें सब कुछ विलीन होता है, सब…
  29. Verses 45–53यह था, है और होगा इस प्रकार का क्रमयुक्त जगत्‌ का भान अविद्यामात्र ही है। बन्द किये गये न…