Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, Verses 11–12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, verses 11–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 129 · श्लोक 11,12
संस्कृत श्लोक
कालेनान्यजगज्जातं शृणु वृत्तं विपश्चितः ।
तस्मिन्दूरतरे देशे कस्मिंश्चित्संसृतिभ्रमे ॥ ११ ॥
क्वचिद्ब्रह्ममहाव्योम्नि कस्मिंश्चिद्दृश्यमण्डले ।
तस्य दृश्यात्मना प्राप्ते वस्तुतो ब्रह्मरूपिणि ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्माण्डआवरणभूत तेज से बाहर दसगुना विस्तारयुक्त वायु स्थित है, वायु से बाहर दसगुना निर्मल
आकाश स्थित है । उसके बाद परमशान्त असीम ब्रह्माकाश (अविद्याशबलित ब्रह्माकाश) है, वह
अविनाशी, न प्रकाश है ओर न अन्धकार है, महाविज्ञानघन सुषुप्तितुल्य हे