Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 129 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
भेदो न भेदस्तत्रायं भेदोऽयं यन्मयः किल ।
तद्ब्रह्मैव चिदाभासं चिद्रूपैव हि भिन्नता ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँपर उसने अपने देवशरीर को
पर्वतशिखर के सदृश अत्यन्त महान् गीध आदि द्वारा नोच-नोचकर खाया गया देखा | तदुपरान्त अपने
पूर्वचिन्तित दिगन्त दर्शन में अपने मनोमय देह को ही प्रवृत्त देखा