Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 129 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
तृतीयो मृगतां यातो विपश्चिद्यत्र तिष्ठति ।
स कदाचित्ससंसारो गोचरे नोऽवतिष्ठते ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त जल को
लँघकर उसके बाद वह सूर्यो के समूह की नाई भीषण प्रलयाग्नि की घनघोर ज्वालाओं के पिण्डीभूत
कोटर के समान चमकीले तेज को प्राप्त हुआ । आशय यह कि तैजस आदि आवरणों को जल की
तरह आधार की अपेक्षा नहीं है, इसलिए सन्धि का विभाग न होने से पिण्डकोटर के तुल्य देदीप्यमान
यह कथन है