Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 128
एक सौ छब्बीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ सत्तारईसवों सर्ग॑ भूमि, नक्षत्रमण्डल आदि की स्थिति उसके पश्चात् आकाश तदनन्तर ब्रह्माण्ड के दो खप्परों का वर्णन |
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- Verse 1श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, यह निराधार भूगोल केसे स्थित है, नक्षत्र मण्डल, जिसका कोई…
- Verse 2श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामजी, जैसे बालक के संकल्प से परिकल्पित कन्दुक (गेंद) आकाश…
- Verse 3अथवा मिथ्या होने से ही उसके पतन की शका नहीं है, ऐसा कहते है। जैसे तिमिररोग से पीडित नेत्र…
- Verse 4दीवार आदि के आधार में रहता है तथापि काल्पनिक स्तम्भ आदि के अवास्तविक होने से उनसे धारण कि…
- Verse 5अथवा सब वस्तुओं के स्वभाव की सिद्धि चित् के अधीन है किसी से धारण न की गई गोल आकारवाली भू…
- Verse 6केशचन्द्र आदि का दर्शन” यहाँपर केशदर्शन का स्पष्टीकरण करते हैं। जिस पुरुष के नेत्रों में…
- Verse 7नदी आदि का नीचे की ओर बहना आदि स्वभाव से विपरीत स्वभाव का भी यदि कहीं चित् द्वारा अवभास…
- Verse 8इसी कारण तत्-तत् वादियो की भूमि का निरन्तर नीचे गिरना, ऊपर जाना, घूमना, तैरना आदि कल्पन…
- Verse 9यदि पृथिवी का बुद्धि अवच्छिन्न चैतन्य में यह निश्चल है, यो भान हो तो वह निश्चल ही प्रतीत…
- Verse 10इसी प्रकार सत्वादी तथा असत्वादियो का चिद्भान के अनुसार सौरपरिवार तथा पृथ्वी मण्डल वैसे…
- Verse 11दो प्रश्नों का उत्तर हो चुकने पर तृतीय प्रश्न का उत्तर देते है। यह पृथिवी लोकालोक पर्वत त…
- Verse 12उस पर्वत का लोकालोक नाम पड़ने मे निमित्त कहते हैं। परिखा के चारों ओर रहनेवाले नक्षत्रमण्ड…
- Verse 13लोकालोक पर्वत के परले पार स्थित आकाशमण्डल से अतिदूर चारों ओर नक्षत्रमण्डल परिभ्रमण करता है
- Verse 14नक्षत्र मण्डल नीचे ओर ऊपर कहाँतक विस्तृत है ? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं । पाताल से…
- Verse 15यह नक्षत्रमण्डल लोकालोक पर्वत के शिखरपर पाताल सहित सारी पृथ्वी की प्रदक्षिणा करता है ओर व…
- Verse 16लोकालोक पर्वत सहित भूलोक से दुगुने आकाशमण्डल के अनन्तर पके हुए अखरोट के कड़े छिलके के समा…
- Verse 17आकाश से नक्षत्रमण्डल का अन्तर्दलविस्तार दुगुना है दिशाओं में घुमने की स्थिति बेल के छिलके…
- Verse 18शबल ब्रह्म का सत्य संकल्पात्मक जिस प्रकार का कथन है, वही इस प्रकार के संनिवेश से यानी ब्र…
- Verse 19उसके बाद नक्षत्रमण्डल से दुगुना पूर्वोक्त आकाश से दूसरा आकाश है और वह कहीं पर प्रकाश से ज…
- Verses 20–21उस आकाश के आखिरी छोरपर ब्रह्माण्डकपाल है । उनमें एक कपाल ऊपर है और एक नीचे है। इन दोनों क…
- Verse 22एक अरब योजन विस्तीर्ण वज्र के समान कड़ा और मजबूत कल्पनामात्रस्वरूप परमार्थरूप में आकाश का…
- Verses 23–46सब वस्तुओं का गिरना, उडना, तिरछे चलना तथा एक जगह खड़ा रहना जो प्रतीत होता है वह सब प्रत्य…