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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 128, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 128, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । संकल्पपथिकत्वेन यथान्तःपुरवासिनः । इदं मनः प्रसरति तथास्य प्रसृतं मनः ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

एक अरब योजन विस्तीर्ण वज्र के समान कड़ा और मजबूत कल्पनामात्रस्वरूप परमार्थरूप में आकाश का विकार पंचीकृत भूतकार्यरूप आकाश चिदाकाश ही है, उससे पृथक्‌ नहीं है, वह आकाश में स्थित है॥ २ १॥ महागोलाकार आकाश में ज्योतिर्मण्डल सभी ओर व्याप्त रहता है। ऐसी परिस्थिति में इस ज्योतिश्चक्र में क्या ऊपर है, क्या नीचे है, क्या पूर्व है, क्या पश्चिम है ? यदि है तो सभी ऊपर है, सभी नीचे है सभी पूर्व तथा पश्चिम है