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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 128, Verse 9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 128, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

सर्वेषामेव भावानां स्थितः कल्पकरत्नवत् । सर्वदा पार्थिवो भागस्तेनात्रैते पतन्त्यलम् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि पृथिवी का बुद्धि अवच्छिन्न चैतन्य में यह निश्चल है, यो भान हो तो वह निश्चल ही प्रतीत होगी । जो प्राणी रात- दिन अप्रतिहत नेत्र हैं, उनकी दृष्टि मेँ यह सदा प्रकाशवाली है तथा जन्मान्ध लोगों की दृष्टि में सदा ही प्रकाशशून्य है