Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 128, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 128, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
न किंचित्कचयत्यत्र समे कचनरूपिणि ।
तादृद्ध्ययं तथारूपं तदात्मन्येव संस्थितम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
यह नक्षत्रमण्डल लोकालोक पर्वत के शिखरपर पाताल सहित सारी पृथ्वी की प्रदक्षिणा करता है ओर
वह चित् की कल्पना से अतिरिक्त नहीं हे